
चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम के जंगलों में हाथियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां हाथियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते 26 वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि जिले के चार वन प्रमंडलों में अब तक 66 हाथियों की मौत हो चुकी है। चिंता की बात यह है कि हाल के एक महीने में ही तीन हाथियों की जान चली गई। लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था, सुरक्षा इंतजाम और वन्यजीव संरक्षण के दावों की वास्तविक स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताजा घटनाओं के बाद वन विभाग के उच्चाधिकारी भी सक्रिय हुए हैं। मुख्य वन संरक्षक स्मिता पंकज ने चाईबासा वन प्रमंडल क्षेत्र में हाथियों की लगातार हो रही मौत पर गंभीर चिंता जताते हुए विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है। संबंधित अधिकारियों को टीम गठित कर घटनाओं की गहन जांच करने, मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाने और अब तक की गई कार्रवाई का ब्योरा दो दिनों के भीतर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
एक महीने में तीन हाथियों की मौत ने बढ़ाई चिंता
पश्चिमी सिंहभूम में हाल के दिनों में हाथियों की मौत की तीन घटनाएं सामने आई हैं। पांच नवंबर को झींकपानी थाना क्षेत्र में सालिकुटी और जोड़ा पोखर गांव के बीच करंट की चपेट में आने से एक हाथी की मौत हो गई। इससे पहले मंगलवार रात टांकुरा गांव के टोला में करीब 35 वर्षीय मादा हाथी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। इस घटना में मौत की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं हो सकी है। वहीं, अक्टूबर में रंगारबेड़ा गांव में भी दो हाथियों की मौत की घटना सामने आई थी। लगातार हो रही इन घटनाओं ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है।
चाईबासा वन प्रमंडल में सबसे ज्यादा 34 हाथियों की मौत
पश्चिमी सिंहभूम जिले के चार वन प्रमंडलों में हाथियों की मौत के आंकड़े भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2000 से अब तक दर्ज मौतों में चाईबासा वन प्रमंडल सबसे आगे है। यहां 34 हाथियों की जान जा चुकी है। इसके बाद कोल्हान वन प्रमंडल में 13, सारंडा वन प्रमंडल में 11 और पोड़ाहाट वन प्रमंडल में आठ हाथियों की मौत दर्ज की गई है। इस तरह जिले में कुल 66 हाथियों की मौत हो चुकी है।
वन प्रमंडलवार हाथियों की मौत
- चाईबासा वन प्रमंडल : 34
- कोल्हान वन प्रमंडल : 13
- सारंडा वन प्रमंडल : 11
- पोड़ाहाट वन प्रमंडल : 08
- कुल : 66 हाथी
कहीं बिजली का करंट तो कहीं मौत की गुत्थी अनसुलझी
हाथियों की मौत के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां सामने आ रही हैं। ताजा घटनाओं में एक हाथी की मौत बिजली के करंट से हुई, जबकि टांकुरा में मादा हाथी की मौत के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जंगल और ग्रामीण इलाकों में बिजली के तारों से हाथियों को बचाने के लिए क्या पर्याप्त इंतजाम हैं? संदिग्ध परिस्थितियों में होने वाली मौतों की जांच कितनी प्रभावी तरीके से होती है? क्या घटनाओं के बाद जिम्मेदारी तय होती है?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े जानकारों के मुताबिक, हाथियों की सुरक्षा के लिए जंगलों में नियमित निगरानी, बिजली के तारों से पैदा होने वाले खतरों की पहचान और संदिग्ध मौतों की वैज्ञानिक जांच बेहद जरूरी है। खासकर ग्रामीण और वन क्षेत्रों में बिजली विभाग तथा वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी घटनाओं का खतरा कम किया जा सकता है।
मुख्य वन संरक्षक ने मांगी दो दिनों में रिपोर्ट
लगातार हो रही मौतों को गंभीरता से लेते हुए मुख्य वन संरक्षक स्मिता पंकज ने संबंधित अधिकारियों को जांच के निर्देश दिए हैं। उन्होंने टीम गठित कर सभी घटनाओं की विस्तृत पड़ताल करने, हाथियों की मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाने और अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट दो दिनों के भीतर देने को कहा है। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है।
सिर्फ जांच नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए सुरक्षा व्यवस्था
पश्चिमी सिंहभूम में 26 वर्षों के दौरान 66 हाथियों की मौत का आंकड़ा केवल वन्यजीवों के नुकसान तक सीमित नहीं है। यह संरक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता की भी परीक्षा है। एक ओर हाथियों की आवाजाही वाले इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती है, तो दूसरी ओर बिजली के तारों और संदिग्ध परिस्थितियों में होने वाली मौतें नई चिंता पैदा कर रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच रिपोर्ट में मौत के कारण सामने आने के बाद वन विभाग क्या ठोस कदम उठाता है और क्या उन कदमों का असर जंगलों में हाथियों की सुरक्षा पर दिखाई देगा?












