
- पुराने और अनुपयोगी रेल सामान की बिक्री से हासिल की बड़ी उपलब्धि, निर्धारित लक्ष्य को भी काफी पीछे छोड़ा
जमशेदपुर : रेलवे के लिए जिस कबाड़ को कभी अनुपयोगी समझकर किनारे कर दिया गया था, वही अब कमाई का बड़ा जरिया बन गया है। पुराने रेल उपकरण, लोहे के सामान और वर्षों से पड़े अनुपयोगी संसाधनों की बिक्री ने दक्षिण पूर्व रेलवे के खजाने में करोड़ों रुपये का इजाफा किया है। चालू वित्त वर्ष में अक्टूबर 2026 तक दक्षिण पूर्व रेलवे ने स्क्रैप बेचकर 403.86 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है। इस प्रदर्शन के साथ दक्षिण पूर्व रेलवे देश के सभी जोनल रेलवे में पहले स्थान पर पहुंच गया है।
खास बात यह है कि रेलवे ने इस अवधि के लिए 240 करोड़ रुपये की कमाई का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन वास्तविक आय ने इस आंकड़े को काफी पीछे छोड़ दिया। निर्धारित लक्ष्य की तुलना में रेलवे ने 68.28 प्रतिशत अधिक राजस्व हासिल किया है। वहीं, पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले इस बार स्क्रैप बिक्री से होने वाली कमाई में 55.37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
अक्टूबर में ही 90 करोड़ से अधिक की कमाई
दक्षिण पूर्व रेलवे की इस उपलब्धि में अक्टूबर महीने की भूमिका भी काफी अहम रही। स्वच्छता विशेष अभियान 6.0 के तहत रेलवे ने अक्टूबर में स्क्रैप बिक्री से 49 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा था। इसके विपरीत एक ही महीने में 90.43 करोड़ रुपये की अनुपयोगी सामग्री बेच दी गई। यानी निर्धारित लक्ष्य से लगभग 84.55 प्रतिशत अधिक कमाई हुई।
अक्टूबर महीने के प्रदर्शन ने दक्षिण पूर्व रेलवे को देश के अन्य सभी जोनल रेलवे से आगे बनाए रखा। इससे स्पष्ट है कि रेलवे ने अनुपयोगी सामान को सिर्फ परिसर से हटाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राजस्व जुटाने के अवसर के रूप में भी इस्तेमाल किया।
जीरो स्क्रैप मिशन ने बदली तस्वीर
इस उपलब्धि के पीछे रेलवे के जीरो स्क्रैप मिशन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन के निर्देश पर जोन के विभिन्न डिपो, वर्कशॉप, शेड और अन्य परिसरों में लंबे समय से जमा अनुपयोगी सामान की पहचान की गई। इसके बाद उसकी बिक्री की प्रक्रिया को तेज किया गया।
इसके लिए पूरे जोन में ‘मैपिंग एंड मॉनिटरिंग’ अभियान चलाया गया। इसके तहत उन स्थानों को चिह्नित किया गया, जहां वर्षों से कबाड़ जमा था। स्क्रैप की उपलब्धता का आकलन करने के साथ उसकी बिक्री और नीलामी की प्रक्रिया को गति दी गई। बिक्री के बाद संबंधित परिसरों से अनुपयोगी सामग्री को तत्काल हटाने पर भी जोर दिया गया।
कमाई के साथ रेलवे परिसरों की सफाई भी
इस अभियान का फायदा रेलवे को दो स्तरों पर मिला है। एक तरफ पुराने और अनुपयोगी सामान की बिक्री से करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर रेलवे परिसरों में वर्षों से जमा कबाड़ हटने से जगह खाली हुई है। इससे डिपो, वर्कशॉप और अन्य संस्थानों में बेहतर व्यवस्था बनाने का रास्ता भी खुला है।
रेलवे का दावा है कि दक्षिण पूर्व रेलवे की अधिकांश कार्य इकाइयां पहले ही जीरो स्क्रैप का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। चिह्नित परिसरों से अनुपयोगी सामग्री हटाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया है। इस अभियान में स्टोर्स विभाग और विभिन्न रेलवे संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कबाड़ को संसाधन बनाने की पहल
रेलवे की यह उपलब्धि बताती है कि सही प्रबंधन और समय पर कार्रवाई से अनुपयोगी समझे जाने वाले संसाधन भी बड़ी आर्थिक ताकत बन सकते हैं। स्क्रैप बिक्री से रेलवे को अतिरिक्त राजस्व मिल रहा है, वहीं स्वच्छता अभियान को भी मजबूती मिल रही है। अब इस प्रदर्शन के साथ दक्षिण पूर्व रेलवे ने देशभर के जोनल रेलवे के सामने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की एक मिसाल पेश की है।












